A world of emotions, woven gently into words

Poetry has always been the place where Yojna feels most at home — a quiet space where she observes life, listens deeply, and allows emotions to find their own rhythm on paper.

Her work moves across forms with ease: songs, ghazals, lyrical pieces, social-commentary poems, reflective verses, and intimate personal musings.
This range is rare, yet it comes naturally to her, shaped by the many worlds she has lived in.

Her poems often grow from everyday moments — a silence, a memory, a small question, or a fleeting feeling.
Through simple language and honest reflection, she writes about experiences that touch all of us: love, loss, identity, womanhood, longing, resilience, and the quiet truths that shape our lives.

मौन और अभिव्यक्ति

मैंने सदियों से,
“मौन” लिखा,
तो तुम
मुझ पर “चिल्लाते” रहे !

मैं,
चुपचाप नदी के किनारे
चबूतरा बन बैठ गयी,
तो तुमने
घाटों पे महफिलें जमा दीं !

बड़े सुन्दर,
सतरंगी पंख,
कजरारी आँखें हैं मेरी !

पर तुमने
बस मेरे वक्ष पे निगाहें जमायीं !

बहुत कुछ है मेरे अन्दर,
जो “मुझे”,
मेरे वजूद,
मेरे चरित्र को
बनाता है !

पर तुमने
उसे बस
मेरी यौनिकता से जोड़ दिया !
मेरी चोटी में मैंने
दुनिया गूंथ ली थी,
तो तुम बोले कि
खुले बाल मुझे मुक्ति देंगे !

मेरी जीभ को तुमने,
अपने दाँतों में दबाए रखा
ताकि मेरी चीख भी
तुम्हारे अन्दर समा जाए !

फिर तुम कहते हो
कि “मैं” धरती हूँ,
इसलिए फसलें उगाती रहूँ !
फिर तुम कहते हो
कि “मैं” देवी हूँ !
इसलिए आशीर्वाद तुम्हारा हक़
और देना मेरा काम है !
फिर तुम कहते हो,
कि मैं चुप रहती हूँ तो
बहुत प्यारी और मासूम लगती हूँ !

इसलिए बंद होंठ,
गुंथी चोटी में,
तुम्हारा संसार सम्भालूँ,
बन के ठूंठ,
किसी चबूतरे पे नदी किनारे !

पर जानते हो ?
मेरी आवाज़ भी बहुत प्यारी है,
और चीख सुरीली…

बस
बस
बस
बहुत हुआ अब छलावा !

मैंने सदियों से मौन लिखा,
तो तुम मुझ पे चिल्लाते रहे…

अब “मैं” तोड़ रही हूँ
ये “मौन”
और लिख रही हूँ

“अभिव्यक्ति” नयी कलम से …

राम कथा अंश

राम गए तो श्वास गई, शेष जीवन अब बस इक श्राप,
रोता आंगन, रोता सिंहासन, समूची अयोध्या करे संताप।

दशरथ सन्न, मरणासन्न, कौशल्या के हृदय में भीषण हाहाकार,
कल तक जो आँगन दीपों से सजा, उसमे आज बसा बस अंधकार।
चहुँओर सन्नाटा फैला है, मन देहरी पर ठहरा है, हर श्वास भरे इक ‘आह’,
नहीं कटते यहाँ चार पहर, बोलो! कैसे चौदह बरस हम निहारें तुम्हारी राह।

दशरथ बोले ! –
माना राम! तुम्हारे बलिदान से ऊँचा हुआ रघुकुल प्रताप,
पर क्या करे ये अभागा पिता, अब सिवाय पश्चाताप ।
तुम जो गए तो श्वास गई, शेष जीवन अब बस इक श्राप,
रोता आंगन, रोता सिंहासन, समूची अयोध्या करे संताप।

कौशल्या की आँखों में सावन, धड़कन में राम की करुण पुकार है,
महलों के राजकुमार को काँटों की शैया, कैसा घनघोर अत्याचार है।
उस नई नवेली दुल्हन का सोच, जिसने इक पल में सब त्याग दिया,
उठती है कटीली टीस दिल में माँ के, सीता ने जो बलिदान किया।
सुमित्रा की आँखों में जल है, और मन में मौन सहनशीलता का ताप,
लक्ष्मण जैसे भाई की माँ होने का गर्व करे, या बिछड़न का प्रलाप ?

कहती सुमित्रा,
राम-लक्ष्मण, सिया संग श्वास गई, जीवन शेष बस इक श्राप,
रोता घर आंगन, रोता सिंहासन, पूरी अयोध्या करे संताप।

मंथरा ने ओढ़ी कुटिल मुस्कान, कैकेयी ने पहना विजय का ताज,
राम गए तो राह खुली — अब भरत को ही मिलेगा अयोध्या राज।
ममता हारी, अच्छाई टूटी, छल कपट को विजय की राह मिली,
कैकेयी फूले मन ना समाती थी, आख़िर मन मानी चाह मिली।
कुटिल मन ख़ुशी से नाच रहा था, पर भीतर कुछ काँप रहा था,
छल कपट से पूरी तो हो गई इच्छा, पर मन अनहोनी भाँप रहा था ।
कहती कैकेयी –
मैंने बस मातृ धर्म निभाया है, मेरे हृदय में नहीं कोई पश्चाताप,
मैं क्या करूँ गर मेरा सौभाग्य बने, कौशल्या-सुमित्रा का अभिशाप।

उधर रोते रोते कहती है प्रजा कि –
हमारे “राजा राम” गए तो श्वास गई, शेष जीवन अब बस इक श्राप,
रोता आंगन, रोता सिंहासन, समूची अयोध्या करे संताप।

एक प्रेम-गीत - कुछ मैं तुझ सी, कुछ तू मुझ सा

तेरा साथ ज़िंदगी जीने
का सलीक़ा हो गया!
कुछ मैं तुझ सी हो गयी
कुछ तू मुझ सा हो गया!

तूने मैंने मिल कर देख,
आसमानों पर क़ब्ज़ा किया
कभी मैं तेरा चाँद थी,
अब तू मेरी रोशनी हो गया!
कुछ मैं तुझ सी हो गयी
कुछ तू मुझ सा हो गया!

चलते रहे सहराओं में,
ता-ज़िंदगी हम बेचैन!
कुछ यूँ घुला तू धड़कनों में,
साँसों का सिलसिला हो गया!
कुछ मैं तुझ सी हो गयी,
कुछ तू मुझ सा हो गया !

कभी ग़ुरबत कभी रहमत,
बदलती फ़ितरत ये ज़िन्दगी!
बस तेरे संग जो बीता वो पल,
जन्नत सरीखा हो गया !
कुछ मैं तुझ सी हो गयी
कुछ तू मुझ सा हो गया !

यूँ तो पढ़ डाले मैंने,
दुनिया के शायर तमाम,
पर तुझ को पढ़ के ही मैं,
ग़ालिब, कबीरा हो गया!
कुछ मैं तुझ सी हो गयी
कुछ तू मुझ सा हो गया!

“Poetry is the place where the heart finally speaks a language the world understands.”

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